Friday, November 9, 2018

ShriYamunAshtaka श्रीयमुनाष्टकम्


ShriYamunAshtaka 
ShriYamunAshtaka is in Sanskrit. It is a very beautiful creation of Param Poojya AdiShankaracharya. He is asking Goddess Yamuna to wash all the sins of people whosoever recites/listens this Ashtakam.
श्रीयमुनाष्टकम्
मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी ।
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी ।
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जदुर्मदा 
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ १ ॥
१) जो भगवान कृष्णके अङ्गोंकी नीलिमा लिये हुए मनोहर जलौघ धारण करती है, त्रिभुवनका शोक हरनेवाली होनेके कारण स्वर्गलोकको तृणके समान सारहीन समझती है, जिसको मनोरम तटपर निकुञ्जों पुञ्ज वर्तमान है, जो लोगोंका दुर्मद दूर कर देती है; वह कालिन्दी यमुना सदा हमारे आन्तरिक मलको धोवे ।  
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता  
भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम् ।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता 
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ २ ॥ 
२) जो मलापहारी सलिलसमूहसे अत्यन्त सुशोभित है, मुक्तिदायक है, सदा ही बडे-बडे पातकोंको लूट लेनेमें अत्यन्त प्रवीण है, सुन्दर नन्द-नन्दनके अङ्गस्पर्शजनित रागसे रञ्जित है, सबकी हितकारिणी है, वह कालिन्दी यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको धोवे ।
सत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका 
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका 
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ३ ॥  
३) जो अपनी सुहावनी तरङ्गोंके सम्पर्कसे समस्त प्राणियोंके पापोंको धो डालती है, जिसके तटपर नूतन मधुरिमासे भरे भक्तिरसके अनेकों चातक रहा करते हैं, तटके समीप वास करनेवाले भक्तरुपी हंसोंसे जो सेवित रहती है और उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है, वह कालिन्द-कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक मलको मिटावे । 
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता 
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता 
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ४ ॥ 
४) जिसके तटपर विहार और रास-विलासके खेदको मिटा देनेवाले मन्द-मन्द वायु चल रही है, जिसके नीरकी सुन्दरताका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता, जो अपने प्रवाहके सहयोगसे पृथ्वी, नदी और नदोंको पावन बनाती है; वह कलिन्दानन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ।  
तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता 
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता 
भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ५ ॥  
५) लहरोंसे सम्पर्कित वालुकामय तटसे जिसका मध्यभाग सुशोभित है, जिसका वर्ण सदा ही श्यामल रहता है, जो शरद ऋतुके चन्द्रमाकी किरणमयी मनोहर मञ्जरीसे अलङ्कृत होती है और सुन्दर सलिलसे संसारको सन्तोष देनेमें जो कुशल है, वह कलिन्दानन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ।       
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी 
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ६ ॥ 
६) जो जलके भीतर क्रीडा करनेवाली सुन्दरी राधाके अङ्गरागसे युक्त है, अपने स्वामी श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शसुखका, जो अन्य किसीके लिये दुर्लभ है, उपभोग करती है, जो अपने प्रवाहसे प्रशान्त सप्तसमुद्रोंमे हलचल पैदा करनेमें अत्यन्त कुशल है; वह कलिन्दानन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ।  
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी 
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी 
सदावगाहनवतीर्णभर्तृभृत्यनारदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ७ ॥  
७) जलमे धुलकर गिरे हुए श्रीकृष्णके अङ्गरागसे अपना अङ्गस्नान करती हुई सखियोंसे जिसकी शोभा बढ रही है, जो राधाकी चञ्चल अलकोंमें गुँथी हुई चम्पक-मालासे मालाधारिणी हो गयी है, स्वामी श्रीकृष्णके भृत्य नारद आदि जिसमें सदा ही स्नान करनेके लिये आया करते हैं, वह कलिन्दानन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ।  
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला 
तटोत्थफुलल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्जवला ।
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा ।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ८ ॥ 
८) जिसके तटवर्ती मञ्जुल निकुञ्ज सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी लीलाओंसे सुशोभित होते हैं; किनारेपर बढकर खिली हुई मल्लिका  और कदम्बके पुष्प-परागसे जिसका वर्ण उज्ज्वल हो रहा है, जो अपने जलमें डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको भवसागरसे पार कर देती है, वह कलिन्दानन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ।    
॥ इति प.पू. श्रीआदि शंकराचार्य विरचितम् श्रीयमुनाष्टकम् संपूरणम् ॥
ShriYamunAshtaka 
श्रीयमुनाष्टकम्


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