Wednesday, September 27, 2017

Shri Saraswati Chalisa श्रीसरस्वती चालीसा


Shri Saraswati Chalisa 
Shri Saraswati Chalisa is in Hindi. It is a beautiful creation of RamSagar. He was a great devotee of Goddess Saraswati. At the end He is asking Goddess to bless him and devotees with Intelligence, Knowledge and power and remove all difficulties from the life.
श्रीसरस्वती चालीसा
दोहा 
जनक जननि पदम दुरज, निज मस्तक पर धारि ।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि ॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमाअमित अनन्तु ।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु ॥
॥ चौपाई ॥   
जय श्रीसकल बुद्धि बल रासी । 
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥
जय जय जय वीणा कर धारी ।
करती सदा सुहंस संवारी ॥
रुप चतुर्भुज धारी माता ।
सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥
जग में पाप बुद्धि जब होती ।
तब ही धर्म की फीकी ज्याोति ॥
तबहि मातु का निज अवतारा ।
पाप हीन करती महि तारा ॥
बाल्मीकि जी थे हत्यारा ।
तव प्रसाद जानै संसारा ॥
रामचरित जो रचे बनाई ।
आदि कवि पदवी को पाई ॥
कालीदास जो भये विख्याता । 
तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना । 
भये जोऔर ज्ञानी नाना ॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा ।
कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥
मधु कैटभ जो अति बलवाना ।
बाहु युद्ध विष्णु से ठाना ॥
समर हजार पॉंच में घोरा ।
फिर भी मुख उनसे नहीं मोर ॥
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । 
बुद्धि विपरीत भई खलहाला ॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी ।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥
चंड मुंड जो थे विख्याता ।
छण महु संहारेउ तेहि माता ॥
रक्तबीज से समरथ पापी । 
सुरमुनि हृदयधरा सब कॉंपी ॥
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा ।
बार बार विनऊं जगदम्बा ॥
जग प्रसिद्ध जो शुम्भ निशुम्भा ।
छण में बांधे ताहि तूँ अम्बा ॥
भरत मातु बुद्धि फेरेऊ जाई । 
रामचन्द्र बनवास कराई ॥
एहिविधि रावन वध तू कीन्हा । 
सुरनर मुनि सबको सुखदीन्हा ॥
को समरथ तव यश गुनगाना ।
निगम अनादि अनंत बखाना ॥
विष्णु रुद्र अज सकहि न मारि ।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी ।
नाम अपार है दानव भक्षी ॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा ।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता । 
कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥                
नृप कोपित को मारन चाहै ।
कानन में घेरे मृग नाहै ॥
सागर मध्य बाधा या दुःख में । 
हो दरिद्र अथवा संकट में ॥
नाम जपे मंगल सब होई ।
संशय इसमें करइ न कोई ॥
पुत्र हीन जो आतुर भाई ।
सबै छांडि पूजें एहि माई ॥
करै पाठ नित यह चालीसा ।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा ॥
धूपादिक नैवेद्य चढावै ।
संकट रहित अवश्य हो जावै ॥
भक्ति मातुकी करै हमेशा । 
निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ 
बंदी पाठ करें सत बारा ।
बंदी पाश दूर हो सारा ॥
रामसागर बाधि हेतु भवानी ।
कीजै कृपा दास निज जानी ॥
दोहा 
मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रुप ।
डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ॥
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु ।
राम सागर अधम को आश्रय तूही ददातु ॥
॥ इति सरस्वती चालीसा ॥ 
  Shri Saraswati Chalisa 
श्रीसरस्वती चालीसा


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