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Saturday, October 1, 2016

Durga Stuti दुर्गा स्तुतिः


Durga Stuti 
Durga Stuti is in Sanskrit. It is from Shri MahaBhagwat MahaPurana. Durga Stuti is by Holy Vedas. Veda Ruchas say that Hey Durge ! you have created these three worlds by your own will. Brahma, Vishnu and Mahesh; the three Gods are your creations for taking care of the world. Nobody is there who has created you and nobody can describe you and your gunas. God Vishnu by doing your devotion and by your blessings destroys demons and protects the world. God Shiva was able to drink the Kalkut poison by holding your leg on his heart. Mata! Nobody is able to describe you, your Gunas and your charitra. I n the end it is said that Mata! All gods worship you. Please bless the world and your creation.
दुर्गा स्तुतिः
श्रुतय ऊचुः
दुर्गे विश्वमपि प्रसीद परमे सृष्ट्यादिकार्यत्रये 
ब्रम्हाद्याः पुरुषास्त्रयो निजगुणैस्त्वत्स्वेच्छया कल्पिताः ।
नो ते कोऽपि च कल्पकोऽत्र भुवने विद्येत मातर्यतः 
कः शक्तः परिवर्णितुं तव गुणॉंल्लोके भवेद्दुर्गमान् ॥ १ ॥
त्वामाराध्य हरिर्निहत्य समरे दैत्यान् रणे दुर्जयान् 
त्रैलोक्यं परिपाति शम्भुरपि ते धृत्वा पदं वक्षसि ।
त्रैलोक्यक्षयकारकं समपिबद्यत्कालकूटं विषं 
किं ते वा चरितं वयं त्रिजगतां ब्रूमः परित्र्यम्बिके ॥ २ ॥
या पुंसः परमस्य देहिन इह स्वीयैर्गुणैर्मायया 
देहाख्यापि चिदात्मिकापि च परिस्पन्दादिशक्तिः परा ।
त्वन्मायापरिमोहितास्तनुभृतो यामेव देहास्थिता 
भेदज्ञानवशाद्वदन्ति पुरुषं तस्यै नमस्तेऽम्बिके ॥ ३ ॥
स्त्रीपुंस्त्वप्रमुखैरुपाधिनिचयैर्हीनं परं ब्रह्म यत् 
त्वत्तो या प्रथमं बभूव जगतां सृष्टौ सिसृक्षा स्वयम् ।
सा शक्तिः परमाऽपि यच्च समभून्मूर्तिद्वयं शक्तित-
स्त्वन्मायामयमेव तेन हि परं ब्रह्मापि शक्त्यात्मकम् ॥ ४ ॥
तोयोत्थं करकादिकं जलमयं दृष्ट्वा यथा निश्चय- 
स्तोयत्वेन भवेद्ग्रहोऽप्यभिमतां तथ्यं तथैव ध्रुवम् ।
ब्रह्मोत्थं सकलं विलोक्य मनसा शक्त्यात्मकं ब्रह्म त-  
च्छक्तित्वेन विनिश्चितः पुरुषधीः पारं परा ब्रह्मणि ॥ ५ ॥
षट्चक्रेषु लसन्ति ये तनुमतां ब्रह्मादयः षट्शिवा-
स्ते प्रेता भवदाश्रयाच्च परमेशत्वं समायान्ति हि ।
तस्मादीश्वरता शिवे नहि शिवे त्वय्येव विश्वाम्बिके 
त्वं देवि त्रिदशैकवन्दितपदे दुर्गे प्रसीदस्व नः ॥ ६ ॥
॥ इति श्रीमहाभागवते महापुराणे वेदैः कृता दुर्गास्तुतिः सम्पूर्णा ॥
हिंदी अनुवाद (देवी स्तोत्ररत्नाकर गोरखपूर गीताप्रेस धन्यवाद सहित)
वेदोनें कहा
१) दुर्गे ! आप सम्पूर्ण जगत्पर कृपा करे । परमे आपने ही अपने गुणोंके द्वारा स्वेच्छानुसार सृष्टि आदि तीनों कार्योंके लिये ब्रह्मा आदि तीनों देवोंकी रचना की है, इसलिये इस जगतमें आपको रचनेवाला कोई भी नहीं है । मातः आपके दुर्गम गुणोंका वर्णन करनेमें इस लोकमें भला कौन समर्थ हो सकता है ।
२) भगवान् विष्णु आपकी आराधनाके प्रभावसे ही दुर्जय दैत्योंको युद्धस्थलमें मारकर तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं । भगवान् शिवने भी अपने हृदयपर आपका चरण धारण कर तीनों लोकोंका विनाश करनेवाले कालकूट विषका पान कर लिया था । तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली अम्बिके ! हम आपके चरित्रका वर्णन कैसे कर सकते हैं ।
३) जो अपने गुणोंसे मायाके द्वारा इस लोकमें साकार परम पुरुषके देहस्वरुपको धारण करती हैं और जो पराशक्ति ज्ञान तथा क्रियाशक्तिके रुपमें प्रतिष्ठित हैं; आपकी उस मायासे विमोहित शरीरधारी प्राणी भेदज्ञानके कारण सर्वान्तरात्माके रुपमें विराजमान आपको ही पुरुष कह देते है; अम्बिके ! उन आप महादेवीको नमस्कार है ।
४) स्त्री-पुरुषरुप प्रमुख उपाधिसमूहोंसे रहित जो परब्रह्म है, उसमें जगतकी सृष्टिके निमित्त सर्वप्रथम सृजनकी जो इच्छा हुई, वह स्वयं आपकी ही शक्तिसे हुई और वह पराशक्ति भी स्त्री-पुरुषरुप दो मूर्तियोंमे आपकी शक्तिसे ही विभक्त हुई है । इस कारण वह परब्रह्म भी मायामय शक्तिस्वरुप ही है ।
५-६) जिस प्रकार जलसे उत्पन्न ओले आदिको देखकर मान्यजनोंको यह जल ही है -ऐसा ध्रुव निश्चय होता है, उसी प्रकार ब्रह्मसे ही उत्पन्न इस समस्त जगत्को देखकर यह शक्त्यात्मक ब्रह्म ही है - ऐसा मनमें विचार होता है और पुनः परात्पर परब्रह्ममें जो पुरुषबुद्धि है, वह भी शक्तिस्वरुप ही है, ऐसा निश्चित होता है ।
जगदम्बिके ! देहधारियोंके शरीरमें स्थित षट्चक्रोंमे ब्रह्मादि जो छः विभूतियॉं सुशोभित होती हैं, वे प्रलयान्तमें आपके आश्रयसे ही परमेशपदको प्राप्त होती हैं । इसलिये शिवे ! शिवादि देवोंमे स्वयंकी ईश्वरता नहीं है, अपितु वह तो आपमें ही है । देवि ! एकमात्र आपके चरणकमल ही देवताओंके द्वारा वन्दित हैं । दुर्गे ! आप हमपर प्रसन्न हों ।

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराणके अन्तर्गत वेदोंद्वारा की गयी दुर्गास्तुति सम्पूर्ण हुई ॥  
Durga Stuti
दुर्गा स्तुतिः


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Tuesday, August 16, 2016

BhadraKali Stutihi भद्रकालीस्तुतिः


BhadraKali Stutihi 
BhadraKali Stutihi is in Sanskrit. It is the praise of Goddess Kali. The stutihi is done by God Brahma and God Vishnu. It is from MahaBhagwat Mahapurana.
भद्रकालीस्तुतिः
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः 
नमामि त्वां विश्वकर्त्रीं परेशीं ।
नित्यामाद्यां सत्यविज्ञानरुपाम् ।
वाचातीतां निर्गुणां चातिसूक्ष्मां 
ज्ञानातीतां शुद्धविज्ञानगम्याम् ॥ १ ॥
पूर्णां शुद्धां विश्वरुपां सुरुपां ।
देवीं वन्द्यां विश्ववन्द्यामपि त्वाम् ।
सर्वान्तःस्थामुत्तमस्थानसंस्था
मीडे कालीं विश्वसम्पालयित्रीम् ॥ २ ॥
मायातीतां मायिनीं वापि मायां ।
भीमां श्यामां भीमनेत्रां सुरेशीम् ।
विद्यां सिद्धां सर्वभूताशयस्था
मीडे कालीं विश्वसंहारकर्त्रींम्  ॥३ ॥   
नो ते रुपं वेत्ति शीलं न धाम 
नो वा ध्यानं नापि मन्त्रं महेशि ।
सत्तारुपे त्वां प्रपद्ये शरण्ये 
विश्वाराध्ये सर्वलोकैकहेतुम् ॥ ४ ॥
द्यौस्ते शीर्षं नाभिदेशो नभश्च 
चक्षूंषि ते चन्द्रसूर्यानलास्ते ।
उन्मेषास्ते सुप्रबोधो दिवा च
रात्रिर्मातश्चक्षुषोस्ते निमेषम् ॥ ५ ॥
वाक्यं देवा भूमिरेषा नितम्बं 
पादौ गुल्फं जानुजङ्घस्त्वधस्ते ।
प्रीतिर्धर्मोऽधर्मकार्यं हि कोपः 
सृष्टिर्बोधः संहृतिस्ते तु निद्रा ॥ ६ ॥
अग्निर्जिह्वा ब्राह्मणास्ते मुखाब्जं 
संध्ये द्वे ते भ्रूयुगं विश्वमूर्तिः ।
श्वासो वायुर्बाहवो लोकपालाः 
क्रीडा सृष्टिः संस्थितिः संहृतिस्ते ॥ ७ ॥
एवंभूतां देवि विश्वात्मिकां त्वां 
कालीं वन्दे ब्रह्मविद्यास्वरुपाम् ।
मातः पूर्णे ब्रह्मविज्ञानगम्ये 
दुर्गेऽपारे साररुपे प्रसीद ॥ ८ ॥   
॥ इति श्रीमहाभागवते महापुराणे ब्रह्मविष्णुकृता भद्रकालीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
हिंदी भाषांतर (गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा) 
ब्रह्मा और विष्णु बोले 
१) सर्वसृष्टिकारिणी, परमेश्वरी, सत्यविज्ञानरुपा, नित्या, आद्याशक्ति ! आपको हम प्रणाम करते हैं । आप वाणीसे परे हैं, निर्गुण और अति सूक्ष्म हैं, ज्ञानसे परे और शुद्ध विज्ञानसे प्राप्य हैं ।
२) आप पूर्णा, शुद्धा, विश्वरुपा, सुरुपा, वन्दनीया तथा विश्ववन्द्या हैं । आप सबके अन्तःकरणमें वास करती हैं एवं सारे संसारका पालन करती हैं । दिव्य स्थाननिवासिनी आप भगवती महाकालीको हमारा प्रणाम हैं ।
३) महामायास्वरुपा आप मायामयी तथा मायासे अतीत हैं; आप भीषण, श्यामवर्णवाली, भयंकर नेत्रोंवाली परमेश्र्वरी हैं । आप सिद्धियोंसे सम्पन्न, विद्यास्वरुपा,समस्त प्राणियोंके हृदयप्रदेशं निवास करनेवाली तथा सृष्टिका संहार करनेवाली हैं, आप महाकालीको हमारा नमस्कार है ।
४) महेश्र्वरी ! हम आपके रुप, शील, दिव्य धाम, ध्यान अथवा मन्त्रको नहीं जानते । शरण्ये ! विश्र्वाराध्ये ! हम सारी सृष्टिकी कारणभूता और सत्तास्वरुपा आपकी शरणमें हैं । 
५) मातः द्युलोक आपका सिर है, नभोमण्डल आपका नाभिप्रदेश है । चन्द्र, सूर्य और अग्नि आपके त्रिनेत्र हैं, आपका जगना ही सृष्टिके लिये दिन और जागरणका हेतु है और आपका आँखें मूँदलेना ही सृष्टिके लिये रात्रि है ।   
६) देवता आपकी वाणी हैं, यह पृथ्वी आपका नितम्बप्रदेश तथा पाताल आदि नीचेके भाग आपके जङ्घा, जानु, गुल्फ और चरण हैं । धर्म आपकी प्रसन्नता और अधर्म कार्य आपके कोपके लिये है । आपका जागरण ही इस संसारकी सृष्टि है और आपकी निद्रा ही इसका प्रलय है ।       
७) अग्नि आपकी जिह्वा है, ब्राह्मण आपके मुखकमल हैं । दोनों संध्याएँ आपकी दोनों भ्रूकुटियॉं हैं, आप विश्र्वरुपा हैं, वायु आपका श्वास है, लोकपाल आपके बाहु हैं, और इस संसारकी सृष्टि, स्थिति तथा संहार आपकी लीला है । 
८) पूर्णे, ऐसी सर्वस्वरुपा आप महाकालीको हमारा प्रणाम है । आप ब्रह्मविद्यास्वरुपा हैं । ब्रह्मविज्ञानसे ही आपकी प्राप्ति संभव है । सर्वसंसाररुपा, अनन्तस्वरुपिणी माता दुर्गे ! आप हमपर प्रसन्न हों ।   

॥ इस प्रकार श्रीमहाभगवतमहापुराणके अन्तर्गत ब्रह्मा और विष्णुद्वारा की गयी भद्रकालीस्तुति सम्पूर्ण हुई ॥   BhadraKali Stutihi 
भद्रकालीस्तुतिः


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