Wednesday, October 21, 2015

Mahishasoor Mardini Stotram महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र


MahishasoorMardini Stotra 
MahishasoorMardini Stotra is in Sanskrit. It is created by param poojya Shankaracharya. In this stotra acharya describes Goddess in the incranation of Mahakali, MahaLaxmi and MahaSaraswati killed many demons like Mahaishasoor, Shiumbha-Nishumbah, Madhu-Kaitab, Dhoomrlochan, Raktabija and many other demons. The devotee who recites this stotra everyday is blessed by the goddess with fullfilling all his desires and destroys his enemies.
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र 
अयिगिरिनंदिनि नंदितमोदिनि विश्वविनोदिनि नंदिनुते ।
गिरिवर विंध्य शिरोऽधिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकंठकुटुंबिनि भूरिकुटुंबिनि भूरिकृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्दरदषिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते । 
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि कल्मषमोचनि घोररते ।
दनुजनिरोषिणि दुर्मदशोषिणि दुःखविनाशिनि सिंधुनुते ।   
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥  
अयिजगदंब कदंबवनप्रिय वासविलासिनि वासरते ।
शिखरिशिरोमणि तुंगहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैतवभंजिनि कैटभभंजिनि शैलसुते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ 
अयिनिजहुंकृतिमात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशिखे ।
समरविशोणित बीजसमुद्भव बीजलतादिक बीजलते ।
शिवशिवशुंभ निशुंभमहाहव दर्पितभूत पिशाचपते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥  
अयिभो शतमखखंडितकुंडलि तुंडित मुंड गजाधिपते ।
रिपुगजगंड विदारणखंड पराक्रमशौंड मृगाधिपते ।
निजभुजदंड निपातितचंड निपातितमुंड भटाधिपते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥  
हयरणमर्मर शात्रवदोर्धुर दुर्जय निर्जर शक्तिभृते ।
चतुरविचार धुरीण महाशिवदूतकृत प्रमधाधिपते ।
दुरित दुरीह दुराशयदुर्मद दानवदूत दुरंतगते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ 
अयिशरणागत वैरिवधूवर कीरव राभय दानकरे ।
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि विरोधिकृतामल शूलकरे ।
दुर्नमितावर दुंदुभिनाद मुहुर्मुखरीकृतदीनकरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ 
सुरललनातत धेयितधेयित तालनिमित्तज लास्यरते ।
ककुभांपतिवरघोंगत तालक तालकुतूहल नादरते ।
धिंधिं धिमिकिट धिंधिमितध्वनि धीरमृदंग निनादरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
झणझणझांकृत नूपररंजित मोहितशिंजित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटीनटनायत नाटिक नाटक नाट्यरते ।
पदनत पालिनि पालविलोचनि पद्मविलासिनि विश्वधुरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
दनुजनु संगर रक्षणसंग परिस्फुरदंग नटत्कटके ।
कनक निषंग पृषत्कनिषंग रटद्भटभृंग हटावटके ।
हतिचतुरंग जलक्षितिरंग घटद्भहुठंगवलत्कटके ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
महित महाहव मल्लमतल्लिक वेल्ल कटिल्लिक भिक्षुरते ।
विरचित वल्लिक पल्लिक गेल्लिक मल्लिक भिल्लिक वर्गभृते ।
भृतिकृत फुल्लसमुल्लसितारुण पल्लवतल्लज सल्ललिते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
अयितवसु मनस्सु मनस्सु मनोहर कांतिलसत्कल कांतियुते ।
सुतरजनी रजनी रजनी रजनी करिवक्त्र विलासकृते ।
सुनयन नयनसुविभ्र मदभ्र मरभ्रमराधि पविश्वनुते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥  
अविरलगंड गलन्मदमेदुर मन्पद मत्तमदंगज राजगते ।
त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रुपपयोनिधि राजनुते ।
अयिसुदतीजन लालस मानस मोहन मन्मध राजगते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ 
कमल दलामल कोमलकांति कलाकलिताकुल बाललते ।
सकल कलानिचयक्रमकेलि चलत्कलहंस कुलालिकुले ।
अलिकुल संकुल कुवलयमर्दित मौलिमित्समदालिकुले ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ 
कलमुरलीरव वाजित कूजित कोकिल मंजुल मंजुरते ।
मिलित मिलिंद मनोहर गुंफित रंजित शैल निकुंजगते ।
मृगगणभूत महाशबरीगणरिंगण संभृत केलिभृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ 
कटितटनीत दुकूल विचित्र मयूखसुरंजित चंद्रकले ।
निजककानचल मौलिपयोगत निर्जरकुंजर भीरुरुचे ।
प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलताधिक चंद्ररुचे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६॥
विजित सहस्त्र करैक सहस्त्र सुधा समरुप करै कनुते ।
कृतसुततारक संगर तारक तारकसागर संगनुते ।
गजमुख षण्मुख रंजितपार्श्व सुशोभितमानस कंजपुटे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
पदकमल कमलानिलये परिवश्यतियोऽनुदिनंस शिवे ।
अयिकमले विमलेकमलानिलशीकर सेव्यमुखाब्जशिवे ।
तवपदमध्यहि शिवदं दृष्टिपंथ गतमस्तु मभिन्नशिवे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥     
स्तुतिमिति स्तिमितस्तुसमाधिना नियमितो यमिनोऽनुदिनंपठेत् ।
परमयाररमयासतुसेव्यते परिजनोऽपिजनोऽपिजतं भजेत् ॥ १९ ॥
॥ इति श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
Mahishasoor Mardini Stotram 
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र


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